Vibhakti In Sanskrit | Vibhakti Sanskrit - विभक्ति संस्कृत में (यहां समझें) | Sanskrit Vibhakti- संस्कृते विभक्तिप्रकरणम्

Vibhakti In Sanskrit | Vibhakti Sanskrit - विभक्ति संस्कृत में | Sanskrit Vibhakti- संस्कृते विभक्तिप्रकरणम्

प्रिय पाठकों,😍 विभक्ति क्या है? विभक्ति किसे कहते हैं? विभक्ति कितने प्रकार की होती है? संस्कृत में विभक्ति की क्या क्या परिभाषाएं हैं? What Is Vibhakti In Sanskrit? ये सारे सवाल आपके मन में जरुर होंगे अथवा जरूर होने चाहिए। संस्कृत हो या हिंदी, दोनों में विभक्ति का विषय विशेष ध्यातव्य व जानने योग्य है। 


कुछ लोग तो विभक्ति कहने से सीधा कारक का स्मरण कर लेते हैं लेकिन यह ध्यातव्य है कि विभक्ति व कारक दोनों में बहुत बड़ा अन्तर है। विभक्ति कारक दोनों का मानों जैंसे पति-पत्नी का सम्बन्ध है। आज हम विशेष रूप से विभक्ति की चर्चा करेंगे। Vibhakti In Sanskrit- अर्थात् विभक्ति संस्कृत में किसे कहते हैं? विभक्ति की परिभाषा, प्रकार आदि की विस्तृत व रोचक सरल चर्चा हम करने जा रहे हैं। 

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इसी के साथ विभक्ति के पति जैंसे कारक के विषय में भी हम थोड़ी चर्चा जरूर करेंगे। चूँकि कारक (संस्कृत) के विषय में पिछले लेखों में हम विस्तार से चर्चा कर चुके हैं। अतः आज विशेष रूप से विभक्ति (Sanskrit Vibhakti- संस्कृते विभक्तिप्रकरणम्) की ही चर्चा करेंगे। ध्यान रहे, कारक और विभक्ति दोनों में काफी अन्तर है। तो आइये, शुरु करते हैं- Vibhakti In Sanskrit


विभक्ति क्या है🤔 (What Is Vibhakti In Sanskrit)

शायद आपने हिंदी में प्रथमा द्वितीया आदि विभक्ति के बारे में जरूर सुना होगा लेकिन संस्कृत में विभक्ति के बारें में कुछ विशेष बातें हैं जो कि आपको अवश्य जाननी चाहिए। विभक्ति क्या है- इसका उत्तर है विभक्ति विभक्त होने की प्रक्रिया है।

विभज्यते अनया इति विभक्तिः विभागो वा।

जिसके द्वारा (शब्दों को विभिन्न अवस्थाओं में) विभाजित किया जाता है, उसे विभक्ति कहते हैं।

Which divides words in many forms called Vibhakti In Sanskrit


उपरोक्त बतायी गयी विभक्ति की परिभाषा से विभक्ति किसे कहते हैं यह आपको स्पष्ट हो गया होगा। यदि अभी भी स्पष्ट न हुआ हो तो चिन्ता न कीजिये। विभक्ति को हम और सरल तरीके से स्पष्ट करेंगे।

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विभक्ति की परिभाषा (Definition Of The Vibhakti In Sanskrit)

विभक्ति क्या होती है- इसकी सामान्य परिभाषा ऊपर बतायी गयी है। जो शब्दों को विभिन्न अवस्थाओं या प्रकारों में विभाजित करती है विभक्ति कहलाती है। विभक्ति को ही विभाग या विभाजन करने वाला भी कहते हैं। 

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जब हम संस्कृत में विभक्ति की परिभाषा को जानने की जिज्ञासा करते हैं तो पाणिनि का एक सूत्र याद आता है- विभक्तिश्च। यह पाणिनि का संस्कृत व्याकरण विभक्ति संज्ञा विधायक सूत्र है। संस्कृत में इसी सूत्र के द्वारा विभक्ति संज्ञा होती है। पाणिनि के इस सूत्र के अनुसार विभक्ति की परिभाषा को समझिए।

सूत्रम्- विभक्तिश्च

परिभाषा- सुप् प्रत्ययाः तिङ् प्रत्ययाः विभक्तिसंज्ञकाः भवन्ति।

हिंदी अर्थ- सुबन्त और तिङन्त प्रत्ययों की विभक्ति संज्ञा होती है।


पाणिनि के इस सूत्र से विभक्ति संस्कृत में किसे कहते हैं- यह स्पष्ट ज्ञात हो जाता है। सबसे पहले तो पाणिनि के अनुसार यह समझ लीजिए कि विभक्ति एक संज्ञा है जो कि उपरोक्त - विभक्तिश्च सूत्र के द्वारा होती है। 


सुबन्त (राम, बालक आदि) एवं तिङन्त (गच्छति, पठति आदि) की विभक्ति संज्ञा होती है या सरलता के लिए हम यह भी कह सकते हैं कि विभक्ति दो प्रकार की होती है सुबन्त और तिङन्त। इन्हीं सुबन्त अथवा तिङन्त शब्दों के विभिन्न रूपों को विभक्ति के नाम से जाना जाता है। आइये, अब संस्कृत में विभक्ति के प्रकारों को समझिए।

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संस्कृत में विभक्ति कितनी होती हैं- Vibhakti Types In Sanskrit

संस्कृत में विभक्ति कितने प्रकार की होती है- जब हम इस प्रश्न की जिज्ञासा करते हैं तो प्रायः संस्कृत की सात विभक्तियों की याद आती है। वैंसे तो पहले ही बताया गया कि संस्कृत में सुबन्त व तिङन्त दोनों की विभक्ति संज्ञा होती है लेकिन सुबन्त की सात विभक्तियां ही लोक में व्यावहारिक रूप से प्रसिद्ध हैं। वैंसे संबोधन को विभक्ति न मानकर केवल कारक माना जाता है। तब षट् ही विभक्ति होती हैं।


अतः संस्कृत में सात विभक्ति होती हैं। There are seven Vibhakti In Sanskrit- संस्कृते सप्त विभक्तयः भवन्ति।

संस्कृत में सभी विभक्तियों का परिचय

  1. प्रथमा विभक्तिः - Prathamā Vibhakti
  2. द्वितीया विभक्तिः - Dwitiyā Vibhakti
  3. तृतीया विभक्तिः - Tritiyā Vibhakti
  4. चतुर्थी विभक्तिः -  Chaturthi Vibhakti
  5. पंचमी विभक्ति - Panchami Vibhakti
  6. षष्ठी विभक्तिः - Shashti Vibhakti
  7. सप्तमी विभक्तिः - Saptami Vibhakti
  8. संबोधन (विभक्तिः) - Sambodhan Vibhakti


आइये, संस्कृत की इन सात विभक्तियों को संस्कृत सूत्र व अर्थ, परिभाषा सहित सरल तरीके से समझते हैं। संस्कृत की यही सात विभक्तियां हिंदी में भी यथावत् ग्रहण की जाती हैं।

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प्रथमा विभक्ति (Prathamā Vibhakti in Sanskrit)

संस्कृत में प्रथमा विभक्ति कब होती हैं? इसका क्या नियम है- इसके लिए महर्षि पाणिनि ने प्रथमा विभक्ति के लिए संस्कृत सूत्र बताया जो कि संस्कृत व्याकरण सिद्धांत के कारक प्रकरण में भी मिलता है।

प्रथमा विभक्ति सूत्र- प्रातिपदिकार्थलिंगपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा

अर्थ- जो शब्द निश्चित रूप से उपस्थित हो, लिंग वाचक शब्द, परिमाण वाचक शब्द, वचन बोधक शब्दों में सामान्यतः प्रथमा विभक्ति होती है।


उपरोक्त संस्कृत व्याकरण के विभक्ति सूत्र से प्रथमा विभक्ति होती है। प्रथमा विभक्ति के कुछ उदाहरण देखिए-

प्रथमा विभक्ति उदाहरण- कृष्णः, श्रीः, ज्ञानम्, तटः, तटी, तटम्, द्रोणो व्रीहिः आदि।


द्वितीया विभक्ति- Dwitiyā Vibhakti In Sanskrit

संस्कृत व्याकरण विभक्ति प्रकरण में द्वितीया विभक्ति का सूत्र बहुत ही छोटा सा और बहुत सरल है। द्वितीया विभक्ति कंहा होती है, इसका क्या नियम है- इसके लिए पाणिनि ने सूत्र बनाया-

द्वितीया विभक्ति सूत्र- कर्मणि द्वितीया

सूत्रार्थ- कर्म में द्वितीया विभक्ति होती है। अर्थात् जिन शब्दों की कर्म संज्ञा हो जाती है उन शब्दों में द्वितीया विभक्ति होती है।


उपरोक्त सूत्र से कर्म संज्ञा वाले शब्दों में द्वितीया विभक्ति का विधान किया जाता है। कर्मसंज्ञा किसकी होती इसको जानने के लिए आप हमारे पिछले कारक प्रकरण संबंधित लेख अवश्य पढें। 

यंहा सामान्य रूप से यदि कर्म संज्ञा को फिर से याद दिलाएँ तो कर्म संज्ञा उसकी होती है को कर्ता को अभीष्ट होता है। कर्ता जिसे चाहता है उसी की कर्म संज्ञा होती है। इसको उदाहरण सहित समझिए-

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द्वितीया विभक्ति उदाहरण

भक्तः हरिं भजति- भक्त हरि को भजता है।

इस उदाहरण वाक्य में भक्त (भजने वाला) कर्ता है। अतः भक्त में प्रथमा विभक्ति है। भक्ति की मुख्य इच्छा है- हरि को भजना। अतः हरि शब्द की कर्म संज्ञा हुई। इस प्रकार अन्य उदाहरण भी समझें।



तृतीया विभक्ति - Tritiyā Vibhakti In Sanskrit

संस्कृत में तृतीया विभक्ति के विषय में कहा गया है कि कार्य करने के लिए जो साधन होता है, उस साधन की करण संज्ञा होती है और उसी करण संज्ञा शब्द में तृतीया विभक्ति होती है। तृतीया विभक्ति के लिए संस्कृत में सूत्र है-

तृतीया विभक्ति सूत्र- कर्तृकरणयोस्तृतीया

सूत्रार्थ- कर्ता और करण में तृतीता विभक्ति होती है।


उपरोक्त सूत्र से तृतीया विभक्ति का विधान किया जाता है। यंहा ध्यातव्य यह है कि करण में तो तृतीया होती ही है साथ ही कंही कंही कर्ता में भी तृतीया होती है। आइये, तृतीया विभक्ति को उदाहरण सहित समझिए।


तृतीया विभक्ति उदाहरण

रामः बाणेन बालीं जघान। - राम ने बाण से बाली को मारा।

उपरोक्त उदाहरण में रामः (कर्ता प्रथमा विभक्ति), बाणेन (तृतीया विभक्ति), बाली (कर्म- द्वितीया विभक्ति) के शब्द हैं। राम बाण के द्वारा बाली को मारता है।

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चतुर्थी विभक्ति - Chaturthi Vibhakti In Sanskrit

चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग तब किया जाता है जब "के लिए" का प्रयोग किया जाता है। जब कर्ता अपने कर्म से जिस किसी को भी कुछ देना चाहता हो अथवा जिसके लिए कुछ करना करना चाहता हो उसमें चतुर्थी विभक्ति होती है।

चतुर्थी विभक्ति सूत्र- सम्प्रदाने चतुर्थी

सूत्रार्थ- सम्प्रदान (के लिए) इस अर्थ में चतुर्थी विभक्ति होती है।


चतुर्थी विभक्ति उदाहरण

आइये, चतुर्थी विभक्ति को उदाहरण सहित समझिए- चतुर्थी विभक्ति का हिंदी कारक चिह्न- "के लिए" यह है जब हम "के लिए" यह संस्कृत में कहना चाहते हैं तो चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग किया जाता है। 

चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग देने के लिए,खाने के लिए, पीने के लिए आदि अर्थों में किया जाता है। उदाहरण- रामः विप्राय गां ददाति।- रामः ब्राह्मण के लिए गाय देता है।

उपरोक्त उदाहरण वाक्य में- रामः (प्रथमा विभक्ति), विप्राय (चतुर्थी विभक्ति), गाम् (द्वितीया विभक्ति) के शब्द उदाहरण हैं।

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पंचमी विभक्ति - Panchami Vibhakti In Sanskrit

जब किसी चीज से कोई एक चीज अलग होती है उसे अपादान कारक कहा जाता है। अपादान कारक में पंचमी विभक्ति होती है। अपादान शब्द का अर्थ अलग होना। संस्कृत व्याकरण में पंचमी विभक्ति के लिए निम्न सूत्र हैं।

पंचमी विभक्ति सूत्र- अपादाने पंचमी

सूत्रार्थ- अपादान कारक में पंचमी विभक्ति होती है।


उपरोक्त सूत्र में पंचमी विभक्ति का विधान किया जाता है। पंचमी विभक्ति तब होती है जब कोई वस्तु किसी से अलग होती है। आइये, पंचमी विभक्ति को उदाहरण सहित समझिए।

वृक्षात् पत्राणि पतन्ति।- पेड़ से पत्ते गिरते हैं।

उपरोक्त उदाहरण वाक्य में- पेड़ से पत्ते अलग हो रहे हैं। अतः पेड़ की अपादान संज्ञा होने से अपादान में पंचमी विभक्ति हुई है। इस प्रकार - वृक्षात् (पंचमी विभक्ति) का रूप बनता है।

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षष्ठी विभक्ति - Shashti Vibhakti In Sanskrit

षष्ठी विभक्ति संस्कृत में विशेष रूप से समझनी चाहिए। संस्कृत में षष्ठी विभक्ति का कोई कारक नहीं है जैंसे कि अन्य विभक्तियों के- कर्म, करण, सम्प्रदान आदि कारक थे। षष्ठी विभक्ति विना किसी कारक के ही हो जाती है। षष्ठी विभक्ति के लिए संस्कृत व्याकरण में सूत्र है-

षष्ठी विभक्ति सूत्र- षष्ठी शेषे।

सूत्रार्थ- कर्म आदि कारकों के अलावा सम्बन्ध की विवक्षा में षष्ठी विभक्ति होती है। अर्थात् जंहा किसी का संबंध दिखाना हो वंहा षष्ठी विभक्ति होती है।


उपरोक्त सूत्र संस्कृत व्याकरण में षष्ठी विभक्ति का विधान करता है। षष्ठी विभक्ति को सरलता से समझने के इस षष्ठी विभक्ति का एक उदाहरण देखिए।

रामस्य पिता दशरथः आसीत्।- राम के पिता दशरथ थे।


उपरोक्त उदाहरण वाक्य राम के पिता के साथ संबंध है। अतः राम का संबंध बताने के लिए षष्ठी विभक्ति का प्रयोग किया गया। इस प्रकार - रामस्य यह षष्ठी विभक्ति का संस्कृत रूप है।

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सप्तमी विभक्ति - Saptami Vibhakti In Sanskrit

सप्तमी विभक्ति के लिए संस्कृत में विभक्ति प्रकरण के अन्तर्गत एक सूत्र आता है जो कि निम्न है।

सप्तमी विभक्ति सूत्र- सप्तमी अधिकरणे च।

सूत्रार्थ- अधिकरण (कारक) में सप्तमी विभक्ति होती है। अधिकरण को ही आश्रय या आधार भी कहते हैं।


उपरोक्त सूत्र से संस्कृत व्याकरण में सप्तमी विभक्ति का विधान किया गया है। सूत्र का अर्थ है कि अधिकरण में सप्तमी विभक्ति होती है। आइये, सप्तमी विभक्ति को उदाहरण सहित समझिए।


सप्तमी विभक्ति उदाहरण

हस्ते पुस्तकम् अस्ति।- हाथ में पुस्तक है।

उपरोक्त उदाहरण वाक्य में हाथ पुस्तक का आधार या अधिकरण है। अतः हाथ में सप्तमी विभक्ति हुई। इस प्रकार हस्ते- सप्तमी विभक्ति का एकवचन है।

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संबोधन विभक्ति - Sambodhan Vibhakti In Sanskrit

ध्यान रहे संबोधन एक विभक्ति नहीं बल्कि कारक है। संबोधन को भी प्रथमा विभक्ति में ही रखा जाता है। अतः संबोधन कोई विशेष अलग विभक्ति नहीं है। संस्कृत व्याकरण में संबोधन में प्रथमा विभक्ति के लिए निम्न सूत्र है।

संबोधन (प्रथमा) विभक्ति सूत्र- संबोधने प्रथमा

सूत्रार्थ- संबोधन कारक में प्रथम विभक्ति होती है। किसी को बुलाना, पुकारना, संबोधित करना ही संबोधन कहलाता है।


उपरोक्त सूत्र से संबोधन कारक में प्रथमा विभक्ति का विधान किया जाता है। उदाहरण के लिए-

हे राम, त्वमेव परमेश्वरः। - हे राम, तुम ही परमेश्वर हो।

उपरोक्त उदाहरण वाक्य में- राम को संबोधन किया जा रहा है। अतः - "हे राम" यह संबोधन में प्रथमा विभक्ति हुई।

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कारक विभक्ति - Karak Vibhakti In Sanskrit

बहुत सारे पाठकों के मन में यह सवाल होता है कि कारक विभक्ति व उपपद विभक्ति संस्कृत में क्या होती है। सरलता से समझने के लिए सबसे पहले कारक विभक्ति को समझिए। 

कारक विभक्ति वह विभक्ति होती है जो कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान आदि कारकों के आधार पर होती है। उदाहरण के लिए उपरोक्त अभी तक जो विभक्तियों के सूत्र व उदाहरण बताए गये वे सभी कारक विभक्ति के उदाहरण हैं।

कारकम् अधिकृत्य या विभक्तिः भवति सा कारक विभक्तिः।

अर्थ- कारक के आधार पर जो विभक्ति होती है उसे कारक विभक्ति कहते हैं।

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उपपद विभक्ति - Upapada Vibhakti In Sanskrit

उपपद विभक्ति वह विभक्ति होती है जिसको कारक की आवश्यकता नहीं होती। किसी विशेष पद या शब्द को लेकर जिस विभक्ति का विधान किया जाता है उसे उपपद विभक्ति कहते हैं। उदाहरण के लिए- नमः, स्वस्तये, अलम् आदि पदों के योग में होने वाली विभक्ति। नमः श्रीगणेशाय आदि वाक्य। 

उपपदविभक्तेः कारकविभक्तिर्बलीयसी।

अर्थ- उपपद विभक्ति से बलवान कारक विभक्ति को माना जाता है। कारक विभक्ति उपपद विभक्ति से श्रेष्ठ होती है।


विभक्ति पहचाने की ट्रिक (संस्कृत विभक्ति याद करने की ट्रिक)

संस्कृत की सारी विभक्तियों को याद करने के लिए और सामान्य रूप से संस्कृत की सभी विभक्तियों को पहचाने के लिए रामरक्षा स्तोत्र का यह श्लोक बहुत प्रसिद्ध है।

रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे।

रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः।।

रामात् नास्ति परायणं परतरो रामस्य दासोsस्म्यहम्।

रामे चित्तलयः सदा भवतु में भो राम मामुद्धर।।


उपरोक्त इस श्लोक में राम शब्द की सभी सातों विभक्ति के रूप दिए गये हैं। राम शब्द की तरह ही बालक, वानर आदि अकारान्त पुलिंग शब्दों के भी रुप चलते हैं।

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संस्कृत विभक्ति निष्कर्ष - Vibhakti In Sanskrit Conclusion

प्रिय मित्राणि, विभक्ति किसे कहते हैं, विभक्ति क्या होती है, संस्कृत में विभक्ति कितने प्रकार की होती है- आज के Vibhakti In Sanskrit इस लेख में विभक्ति से संबंधित इन सभी विषयों को सरल तरीके से समझाने का प्रयास किया गया। 

इसके अतिरिक्त Karak Sanskrit, Sanskrit Vibhakti PDF, Sanskrit Vibhakti Chart, Sanskrit Vibhakti Tables,विभक्ति पहचाने की ट्रिक (संस्कृत विभक्ति याद करने की ट्रिक) व एक एक विभक्ति की बहुत विस्तार से चर्चा इससे पिछले लेखों में की जा चुकी है। 

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यदि आपने वह लेख नहीं पढें हैं तो अपनी इस वेबसाइट के मेनूबार अथवा होमपेज में - विभक्ति संस्कृत वाले विकल्प को क्लिक करें और पूरा विस्तार से पढें। धन्यवादः। 

हमें उम्मीद है संस्कृत में विभक्ति का आज का यह लेख आपको काफी पसंद आया होगा। पसंद आया हो तो कमेंट शेयर अवश्य करें। पुनः एकवारं धन्यवादः ।



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