काव्यप्रकाश | काव्यप्रकाश नोट्स | Kavyaprakash Notes In Hindi | Kavyprakash PDF

काव्यप्रकाश- काव्यप्रकाश नोट्स ( Kavyaprakash Notes In Hindi) Kavyprakash PDF (हिंदी व संस्कृत)


आज का विषय

  • काव्यप्रकाश का सामान्य परिचय
  • काव्यप्रकाश का स्वरूप
  • काव्यप्रकाश के 10 उल्लास
  • काव्यप्रकाश की टीका
  • काव्यप्रकाश का मंगलाचरण
  • काव्यप्रकाश- काव्य की परिभाषा
  • काव्यप्रकाश- काव्यप्रयोजन
  • Kavyaprakash PDF (Sanskrit & Hindi)


काव्यप्रकाश का सामान्य परिचय (Kavyaprakash In Hindi)

संस्कृत साहित्य में काव्यप्रकाश एक सर्वश्रेष्ठ लाक्षणिक ग्रंथ के रूप में प्रसिद्ध है। काव्यप्रकाश के रचयिता आचार्य मम्मट हैं। आचार्य मम्मट कृत यह काव्यप्रकाश कुल 10 उल्लासों में विभक्त है। काव्यप्रकाश के दस उल्लासों में काव्य की परिभाषा, काव्य के प्रयोजन, काव्यभेद तथा अलंकार आदि विभिन्न विषयों की सुन्दर रूप से चर्चा की गयी है। 

                काव्यप्रकाश का सामान्य परिचय

  •      रचयिता -  

       आचार्य मम्मट

  •      विभाजन- 

       उल्लासों में

  •      कुल उल्लास-

       10 (दस उल्लास)

  •      मम्मट की अन्य उपाधि

       वाग्देवतावतार/ध्वनिप्रतिष्ठापकपरमाचार्य

 

काव्यप्रकाश ग्रन्थ से विभिन्न संस्कृत प्रतियोगी परीक्षाओं में बहुतेरे प्रश्न पूछे जाते हैं। यूजीसी नेट संस्कृत तथा अन्य सभी परीक्षाओं को ध्यान में रखते हुए आज हम काव्यप्रकाश नोट्स के रूप में काव्यप्रकाश की सारगर्भित चर्चा करने वाले हैं।



काव्यप्रकाश का स्वरूप- विभाजन

जैंसे कि हमने आपको बताया काव्यप्रकाश आचार्य मम्मट के द्वारा लिखा गया है जिसमें कि कुल 10 उल्लास हैं। उल्लास को आप अध्याय के रूप में समझ सकते हैं कि काव्यप्रकाश में कुल 10 अध्याय हैं। काव्यप्रकाश श्लोकात्मक तथा सूत्रात्मक दोनों शैली में लिखा गया है। 

सम्पूर्ण काव्यप्रकाश में कुल 142 श्लोक तथा लगभग 212 सूत्र मिलते हैं। कहा जाता है कि काव्यप्रकाश का कुछ भाग अल्लटसूरि नामक विद्वान ने भी लिखा है। काव्यप्रकाश को तीन भागों में विभाजित किया जाता है। कारिका (श्लोक), सूत्र व उदाहरण। काव्यप्रकाश संस्कृत साहित्य की काव्यग्रंथ माला में अमूल्यनिधि है। 

                     काव्यप्रकाश का विभाजन

  •      कुल उल्लास-    

       दस (10)

  •      कुल श्लोक-

        142

  •      कुल सूत्र- 

        212

  •      शैली प्रकार-

        श्लोकात्मक व सूत्रात्मक

 

काव्यप्रकाश के 10 उल्लास

जैंसे कि आप जान चुके हैं काव्यप्रकाश में कुल 10 उल्लास हैं। अलग-अलग उल्लासों में अलग-अलग विषयों का वर्णन मिलता है। काव्यप्रकाश में काव्य किसे कहते हैं? काव्य के प्रयोजन क्या हैं? काव्य कितने प्रकार का होता है? इत्यादि विभिन्न बातों का उल्लेख किया गया है। यंहा निम्न तालिका के माध्यम से काव्यप्रकाश के सभी उल्लासों का नाम (वर्ण्य विषय दिया गया है जो कि सभी परीक्षाओं के लिए अत्यन्त उपयोगी तथा सहायक है।


काव्यप्रकाश के 10 उल्लासों का नाम (वर्ण्य विषय)

  1. प्रथम उल्लास-  काव्य स्वरूप व प्रयोजन
  2. द्वितीय उल्लास- शब्दार्थ का निरूपण
  3. तृतीय उल्लास- अर्थव्यंजकता का उल्लेख
  4. चतुर्थ उल्लास-  रसादि निरूपण तथा ध्वनि वर्णन
  5. पंचम उल्लास- ध्वनिगुणीभूतव्यंग्यकाव्य निरूपण
  6. षष्ठम उल्लास-  शब्दार्थचित्रकाव्य का वर्णन
  7. सप्तम उल्लास- रसदोष,काव्यदोषादि का वर्णन
  8. अष्टम उल्लास- गुणादि निरूपण
  9. नवम उल्लास-  शब्दालंकारों का वर्णन
  10. दशम उल्लास- अर्थालंकारों का वर्णन


काव्यप्रकाश की टीका (टीकाग्रंथ व टीकाकार)

आचार्य मम्मट कृत काव्यप्रकाश संस्कृत साहित्य में शिरोमणि ग्रंथ है। काव्यप्रकाश में पूर्ववर्ती आचार्यों के मत का समन्वय करते हुए काव्यस्वरूप आदि का विस्तृत विवेचन किया गया है। वैंसे तो काव्यप्रकाश पर विद्वानों ने विभिन्न टीकाएं लिखी तथापि परीक्षा दृष्टि को ध्यान में रखते हुए यंहा काव्यप्रकाश की महत्वपूर्ण टीकाओं का उल्लेख किया गया है।

              काव्यप्रकाश की टीका व टीकाकार

  •      संकेतटीका    

       माणिक्यचंद्र कृत (सर्वप्राचीन टीका)

  •      दर्पणटीका

       विश्वनाथ कृत

  •      विरचित टीका

       वाचस्पति विरचित

  •      बालबोधिनी टीका

       वामनाचार्य कृत

 

काव्यप्रकाश का मंगलाचरण 

प्यारे पाठकों, काव्यप्रकाश के अन्तर्गत आचार्य मम्मट ने सर्वप्रथम अपने ग्रंथ की शुरुआत करते समय मंगलाचरण किया है। जी हां, आचार्य मम्मट ने कवि की जो वाणी है उसका वस्तुनिर्देश करते हुए यह मंगलाचरण किया है। काव्यप्रकाश का मंगलाचरण निम्न प्रकार से है।

नियतिकृतनियमरहितां ह्लादैकमयीमनन्यपरतंत्राम्।

नवरसरुचिरां निर्मितिमादधती भारती कवेर्जयति।।

इस प्रकार उपरोक्त इस मंगलाचरण में कवि ने अपनी वाणी रूपी सम्पत्ति की प्रशंसा की है। इस मंगलाचरण में आर्या छन्द है। काव्यप्रकाश के मंगलाचरण में किसकी स्तुति की ग‌ई है - यह प्रश्न भी कदाचित् पूछा जाता है। आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें कि काव्यप्रकाश का मंगलाचरण एक प्रकार से वस्तु निर्देशात्मक मंगलाचरण है। तथापि कवि ने काव्यप्रकाश के मंगलाचरण में कवि की वाणी अथवा मां भारती सरस्वती की स्तुति की है। ऐंसा कहा जा सकता है। 

कवि ने कवि की वाणी को सभी नियमों से परे बताया है क्योंकि कहा भी जाता है- जंहा न पहुंचे रवि वंहा पहुंचे कवि। इस प्रकार कवि ने उस भारती को आह्लादप्रद , नवरस को देने वाली, स्वतंत्र रहने वाली आदि विशेषणों से सुशोभित किया है।


काव्यप्रकाश- काव्य की परिभाषा

आचार्य मम्मट अपने काव्यप्रकाश ग्रंथ में सर्वप्रथम काव्यलक्षण के विषय में कहते हैं कि- 'तददोषौ शब्दार्थौ सगुणावनलंकृती पुनः क्वापि' शब्दार्थ- तद् = काव्यम् , अदोषौ= दोषरहित, सगुणावनलंकृती = सगुणौ+अनलंकृती (एचोsयवायावः - अयादिसंधि) सगुणौ= गुणसहित, अनलंकृती= अलंकाररहित। अर्थात् दोष से रहित एवं गुण से युक्त शब्द ही काव्य है कंही कंही अलंकार न भी हों तो भी दोष रहित गुणयुक्त शब्दार्थ काव्य माना जाता है। ऐंसा आचार्य मम्मट का मत है।

इस प्रकार काव्यप्रकाश के अनुसार काव्य का लक्षण है- तददोषौ शब्दार्थौ सगुणावनलंकृती पुनः क्वापि। अर्थात् दोषरहित गुणसहित कंही-कंही अलंकार रहित शब्दार्थ ही काव्य कहा जाता है।


काव्यप्रयोजन को स्पष्ट कीजिए

काव्यप्रकाश- काव्यप्रयोजन

कहा जाता है कि - प्रयोजनं विना मन्दोsपि न प्रवर्तते। अर्थात् बिना किसी प्रयोजन के तो मूर्ख व्यक्ति भी कोई कार्य नहीं करता। लक्ष्यार्थ है कि प्रत्येक कार्य का कुछ न कुछ प्रयोजन जरूर होता है। साहित्य के सागर में सभी आचार्यों यथा- भरतमुनि, भामह, कुन्तक, विश्वनाथ, जगन्नाथ आदि ने काव्य प्रयोजनों के बारें में बताया है। ठीक उसी प्रकार से साहित्य के महान कवियों में से श्रेष्ठ कवि आचार्य मम्मट ने भी अपने काव्यशास्त्र काव्यप्रकाश में काव्य के प्रयोजनों के बारें में बताया है।  काव्य प्रयोजन का अभिप्राय यह है कि काव्य क्यों किया जाता है? आखिर काव्य लिखने से हमें क्या फायदा होगा, क्या पैंसा मिलेगा? क्या काव्य लिखने से इज्जत मिलेगी? आखिर काव्य लिखने का प्रयोजन क्या है। इसी बात को आचार्य मम्मट ने अपने काव्यप्रकाश में एक सुन्दर श्लोक के माध्यम से बताया है। मम्मट का काव्य प्रयोजन निम्न प्रकार से है।

काव्यं यशसेsर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये।

सद्यः परनिर्वृत्तये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे।।


उपरोक्त 6 मम्मट के काव्य प्रयोजन है। इस श्लोक के माध्यम से आचार्य मम्मट ने काव्य के छः 6 प्रयोजनों का उल्लेख किया है। मम्मट के अनुसार काव्य के छः प्रयोजन होते हैं। जो कि निम्नलिखित हैं- 

काव्यप्रकाश- काव्यप्रयोजन का स्पष्टीकरण

यशसे=  यश के लिए। आचार्य मम्मट का कहना है कि काव्य से यश की प्राप्ति होती है। अब आपके मन में सवाल उठेगा कि काव्य से यश की प्राप्ति होती है। इसका क्या प्रमाण है? क्या कोई ऐंसा काव्य करने व्यक्ति है जिसे यश की प्राप्ति हुई हो तो आचार्य मम्मट इसका उत्तर देते हैं- "कालिदासादीनामिव यशः" अर्थात् कालिदास आदि ऐंसे बहुत से कवि हैं जिन्होंने काव्य लिखकर बहुत यश प्राप्त किया है। आचार्य मम्मट के अनुसार काव्य का यह पहला प्रयोजन है।


अर्थकृते= अर्थ (धनप्राप्ति) के लिए।

काव्य रचना से धन भी मिलता है। सच में मिलता है क्या ! तनिक रुकिए, हम आपको बताते हैं। आचार्य मम्मट मे धन की प्राप्ति को भी काव्य का एक प्रयोजन बताया है। ऐंसा कौन है जिसने काव्य लिखकर धन प्राप्त किया हो। कुमार विश्वास, कपिल शर्मा (हास्यकवि) जैंसे आजकल बहुत से लोग हैं जो काव्य करके धन प्राप्ति करते हैं। न केवल धन अपितु नाम, यश, प्रतिष्ठा, सम्मान आदि बहुत कुछ प्राप्त करते हैं।

आचार्य मम्मट ने धन की प्राप्ति के कुछ उदाहरण दिए हैं- 'श्रीहर्षादेर्धावकादीनामिव धनम्' अर्थात् आचार्य मम्मट कहते हैं कि इतिहास में श्रीहर्ष, धावककवि आदि जैंसे बहुत से कवि हुए हैं जो राजदरबार में रहकर काव्य लिखकर धन की प्राप्ति करते थे। इस प्रकार यह काव्य का दूसरा प्रयोजन हुआ। परीक्षा में इस प्रकार के प्रश्न भी पूछे जाते हैं कि मम्मट ने धनप्राप्ति का उदाहरण क्या दिया तो आपको ध्यान रखना है- श्रीहर्षादि कवि का उदाहरण दिया।


व्यवहारविदे= व्यवहार को जानने के लिए।

आचार्य मम्मट ने काव्य का तीसरा प्रयोजन बताया। व्यवहार ज्ञान। जी हाँ, काव्य लिखने से अथवा पढने से व्यवहार का ज्ञान होता है। कैंसे खाना है, कब पीना है? दूसरे के साथ कैंसा व्यवहार करना है इत्यादि व्यावहारिक बातों का ज्ञान काव्यग्रंथों में आसानी से मिल जाता है। 

इसीलिए मम्मट ने काव्य का एक प्रयोजन व्यवहारविदे भी बताया है। मम्मट ने इसका उदाहरण दिया है- राजादिगतोचिताचारपरिज्ञानम्। अर्थात् काव्य से हमें राजा - रानी आदि के साथ कैंसा व्यवहार करना है इत्यादि बातों का पता चल जाता है।


शिवेतरक्षतये= अनिष्ट निवारण के लिए।

यदि आपको अपना अनिष्ट दूर करना है तो काव्य लिखिए और काव्य पढिए। जी हां, मम्मट ने काव्य का एक प्रयोजन - शिवेतरक्षति अर्थात् अनिष्ट का नाश भी बताया है। काव्य लिखने से अनिष्ट (अमंगल) दूर हो जाते हैं। यदि आप इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो बहुत से ऐंसे उदाहरण मिल जाएंगे जिन्होंने अपना अमंगल दूर करने के लिए काव्य लिखा।

आचार्य मम्मट ने इसका उदाहरण दिया है- आदित्यादेर्मयूरादीनामिवानर्थनिवारणम्। अर्थात् एक बार की बात है। बाणभट्ट की पत्नी के श्राप से मयूरभट्ट नामक कवि को कुष्ठ रोग हो गया था। तब मयूर कवि ने कुष्ठ रोग के निवारण के लिए सूर्य भगवान की उपासना की और उनकी स्तुति में- सूर्यशतक नामक काव्य ग्रंथ लिखा। इस प्रकार मयूर कवि ने काव्य लिखकर अपना अनिष्ट निवारण किया अर्थात् रोग दूर किया। 


सद्यः परनिवृत्ति= आनन्द प्राप्त के लिए

काव्य के सभी प्रयोजनों में सबसे मुख्य प्रयोजन यही है। आचार्य मम्मट के अनुसार काव्य का यही मुख्य प्रयोजन है। सद्यः परनिवृतिः अर्थात काव्य लिखने से तुरंत आनन्द की अनुभूति होने लगती है। आप इस बात का अनुभव स्वयं भी कर सकते हैं। जब कभी आप कुछ काव्य लिखते होंगे तो उसके बादआपको भी बहुत आनन्द मिलेगा। 

इसीको मम्मट ने सद्यः परनिवृत्ति कहा है और यही काव्य के सबसे मुख्य प्रयोजन है इस बात को आचार्य मम्मट स्वयं कहते हैं- सकलप्रयोजनमौलिभूतं समनन्तरमेव रसास्वादनसमुद्भूतं विगलितवेद्यान्तरमानन्दम्। अर्थात् काव्य के सभी प्रयोजनों में यही सबसे श्रेष्ठ व मुख्य प्रयोजन है। यह आपको परीक्षा में भी पूछा जा सकता है। हमें उम्मीद है कि काव्यप्रकाश नोट्स का यह विषय आपको पसंद आ रहा होगा।


कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे= पत्नी के समान उपदेश करने के लिए।

आचार्य मम्मट के अनुसार काव्य का आखिरी प्रयोजन है। आचार्य मम्मट कहते हैं कि यदि आप भी अपनी कान्ता (पत्नी, प्रेमिका) की तरह मीठी-मीठी बातें बोलना चाहते हैं, सुन्दर - सुन्दर उपदेश देने की कला जानना चाहते हैं तो काव्य लिखिए या काव्य पढिए। 

अतः मम्मट ने काव्य का एक प्रयोजन - कान्ता की तरह उपदेश देना (कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे) भी बताया है। परीक्षा दृष्टि से यंहा यह भी ध्यातव्य है कि मम्मट ने उपदेश शैली तीन प्रकार की बताई है जो कि निम्नलिखित है।

               उपदेश शैली के प्रकार- तीन

  • प्रभुसम्मित- शब्दप्रधान (वेदशास्त्र आदि)

  • सुहृत्सम्मित - अर्थप्रधान (इतिहास पुराण आदि)

  • कान्तासम्मित- रसप्रधान (काव्य आदि की शैली)


इस प्रयोजन का भावार्थ यह है कि जैंसे आपने देखा होगा कि कोई प्रेमिका अथवा पत्नी अपने प्रेमी पति से सुन्दर-सुन्दर बातें करती है। वह अपने पति को अच्छे कार्य के लिए समझाती है। तब वह सरस होकर के ही अपने पति या प्रेम को समझाती है। यंहा उसके शब्द व अर्थ दोनों के बजाय भाव अथवा रस की प्रधानता होती है। ठीक उसी प्रकार से काव्य में शब्द व अर्थ के बजाय रस या भाव की प्रधानता होती है। 

अतः काव्य की शैली भी कान्तासम्मित अर्थात पत्नी या प्रेमिका के वचनों के समान होती है। इसीलिए मम्मट कहते हैं कि यदि कान्ता (प्रेमिका) के समान उपदेश देना भी काव्य का एक प्रयोजन है। इस प्रकार काव्यप्रकाश के अन्तर्गत यह काव्य का आखिरी छठवां प्रयोजन बताया गया।

काव्य हेतु तीन बताए गये हैं- शक्ति, निपुणता व अभ्यास। यह विषय विस्तारपूर्वक अगले पाठ में दिया गया। अतः काव्यप्रnकाश के सभी विषयों को क्रमानुसार पढते रहें। हमें उम्मीद है यह काव्यप्रकाश नोट्स आपकी परीक्षा अथवा ज्ञान में चार चांद लगाएगा। धन्यवाद। विभिन्न संस्कृत प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए आप हमारी कस वेबसाइट के मेनूबार में जा सकते हैं अथवा नीचे दिए गये लिंक्स का उपयोगी भी कर सकते हैं। पुनः धन्यवाद।

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