श्री मंगला भगवती माता संस्कृत स्तुति | दक्षिण काली माता स्तुति | महालक्ष्मी मंत्र स्तुति- Mangala Devi Stuti

🌄🎪 श्रीश्रीमङ्गलाम्बस्तुतिमाला 🚩👀

(श्रीमंगला माता की स्तुति)


शुद्धातिशुद्धा विमलापि कान्ता

शान्तप्रशान्तास्थलसंस्थिता त्वम्।

सन्दीपनी-दीप्तिमहाम्बरूपा

धर्मे मतिर्मेsम्ब भवेत्सुशान्ता।।१।।


देवप्रयागस्थितवासिनी सा

या त्वं सुशान्ताश्रमसंस्थिता वै।

त्वमणोरणीयद्महतो महीयद्-

रूपम्हि विद्येत भवानि दुर्गे।।२।।


शक्तीश्वरि त्वं प्रथमेश्वरी वै

प्रमथेश्वरी त्वं प्रभुवल्लभापि।

करुणापरा कालि शिवस्य रूपा

रक्षेत्सुखं देहि सदा त्वधर्मात्।।३।।


वयसास्ति पुत्रं मनसा तु बालं

सन्दीपयेत् सत्यकृते शिशुन्ते।।

पापानि दुःखानि कृतानि नित्यं

दयावति त्वं कुरुताद्धि मे शम्‌।।४।।


श्रीरामपूज्या गुरुवन्दिता या

देवी त्वमेवासि सुशुक्रवन्द्या।

भागीरथीपावनतीर्थमाता

कुर्यात्पवित्रं खलु मानसं मे।।५।।


मनसीह वाचीह सुकर्मणि त्वं

शान्तत्वबुद्धिं कुरुतात्सदा मे।।

कामादितो मे षट्पद्यपुष्पं

रक्षेत्सदातोsत्र हि वन्दतेsयम्।।६।।🙏🙏

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हिंदी शब्दार्थ व भावार्थ-

हे माता! तुम अतिपवित्र, विमल एवं कान्त हो। शान्तिपूर्ण शान्त स्थल में वास करने वाली,  सतत समता पूर्वक दीप की दीप्ति की महाम्ब ज्योतिरूप वाली माता, मेरी बुद्धि को सत-धर्म में अवस्थित करें। (१)


हे भवानि, देवगण भी जहाँ यज्ञ करते हैं अथवा देवशर्मा ब्राह्मण ने यागादि पवित्र कर्मों द्वारा जिस स्थान की शोभा बढाई। ऐसे पवित्र स्थान पर निवास करने वाली वह आप ही हैं। आप सुशान्त धरा पर सदैव वास करती हैं। हे माँ दुर्गे, आप ही सूक्ष्म से सूक्ष्म एवं महत् से महत् रूपों में विद्यमान हो।  (२)


हे शक्तीश्वरि माते! आप ही तुम प्रथम रूपा जननी हैं। प्रमथ भगवान गणेश जी की पूज्य माता या भगवान शिव की पारिषदेश्वरी भी आप ही हैं और आप ही मेरे प्रभु की वल्लभाश्री हैं। हे शिव रूपा, कालि! आप अपार करुणा करने वाली मुझे सुख प्रदान करते हुए अधर्म से सदैव मेरी रक्षा करें। (३)


हे दयावती माता, आयु से पुत्र और मन से बालक अपने शिशु को सत्यार्थ सन्दीप्त करें। इसने न जाने ज्ञाताज्ञातरूप में कितने पाप किए होंगे। हे भवानि मातः! समस्त पापों तथा दुःखों को दूर कर मेरा कल्याण करें। (४)


हे देवि! प्रभु श्रीराम जी के द्वारा सदैव पूजनीय एवं मेरे सद् गुरुमूर्तियों द्वारा वन्दित आप ही ग्रहरूपी जनार्दन सुशुक्र द्वारा सदैव वन्दनीय हैं। भागीरथी (गंगा) के पावन तीर्थ पर वास करने वाली माता मेरे मन व मानस कर्म को पवित्र करे। (५) 

हे भवानि दुर्गे! मेरे इस मन में, वाणी तथा कर्म में शान्तताबुद्धि प्रदान करें। कामादि दैत्यदुर्गुणों से यह षट्पदी पुष्प सदैव मेरी रक्षा करे। अतः हे माता, आपका यह पुत्र आपकी वन्दना करता है। (६)

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