कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में भारतीय छात्र ने संस्कृत व्याकरण पर की रिसर्च, निकाली बड़ी गलती ?🤔- जानिए पूरी जानकारी

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हाल ही में सोशल मीडिया पर एक खबर काफी ट्रेंड पर है कि कैंब्रिज विश्वविद्यालय में पढ़ रहे शोध छात्र ऋषि राजपोपट ने संस्कृत भाषा पर एक ऐसी रिसर्च की जो कि महर्षि पाणिनि की गलती के विषय को संकेतित कर रही है। 

आखिर क्या यह सच में महर्षि पाणिनि की गलती थी या फिर शोध छात्र राजपोपट व कैंब्रिज विश्वविद्यालय की टीम ने इसको गलती के रूप में प्रकाशित किया या फिर सोशल मीडिया ही इसको महर्षि पाणिनि की गलती बता रहा है। यहाँ जानिए। 

मैं आपको इस बात को यहां आलोचनात्मक रूप से स्पष्ट करने का प्रयास कर रहा हूं। ऐसा इसलिए कि मैं स्वयं भी संस्कृत व्याकरण का पारंपरिक से लेकर आधुनिक छात्र रहा हूँ। 

बाल्यकाल से मैंने अष्टाध्यायी, लघु सिद्धांत, व्याकरण सिद्धांत, जैसे ग्रंथों को आदि से अंत तक कंठस्थ कर न केवल संस्कृत भाषा में अपितु अन्य अंग्रेजी भाषा और विभिन्न अन्य विदेशी संस्थानों में भी संस्कृत का प्रचार किया है। 

मैंने संस्कृत ग्रामर एवं अंग्रेजी व अन्य भाषाओं के ग्रामर को बहुत सूक्ष्मता से देखा है। इसी दृष्टि से मैं संस्कृत ग्रामर को बहुत अच्छे से जानता हूं और महर्षि पाणिनि व्याकरण परंपरा को बहुत अच्छे से समझता हूँ। यदि आप मेरे बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं तो About पेज में जा सकते हैं. 

आज मैं बात करने वाला हूं कि क्या वास्तव में महर्षि पाणिनि की यह गलती थी या फिर इसे अपनी प्रसिद्धि के लिए गलती के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। आइए, जानते हैं इसके बारे में पूरी जानकारी. व SanskritExam. Com team का ऋषि राजपोपट के साथ संवाद


लंदन से न्यूज- लंदन प्रेस से यह खबर कल जारी की गई थी कि कैंब्रिज विश्वविद्यालय में एक शोध छात्र ने संस्कृत व्याकरण पर एक ऐसा शोध किया जो कि संस्कृत व्याकरण के जनक महर्षि पाणिनि की गलती को साबित करता है और लगभग 2500 साल यानी जब से संस्कृत व्याकरण की रचना हुई तब से लेकर आज तक कोई इस बात पर विचार भी नहीं कर पाया। 

मैं स्वयं अपनी बात करूं तो शायद मैंने इस विषय पर न जाने कितने बार विचार किया होगा और मुझे इसका जो निष्कर्ष मिला वह यही मिला कि पाणिनि जो अपवाद नियम‌ से सहित व रहित व्याकरण लिखा है। उसमें छेड़खानी करना कुछ जरूरी नहीं है। 

शोध कार्य हालांकि एक अलग विषय है लेकिन अपनी प्रसिद्धि या सोशल मीडिया की प्रसिद्धि के लिए सोशल मीडिया यदि इसको संस्कृत व्याकरण की गलती बताएं तो यह अच्छा नहीं है। आइए जानते हैं इस न्यूज़ के बारे में कुछ जानकारी

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किस गलती पर किया गया शोध

कैंब्रिज विश्वविद्यालय में पढ़ रहे भारतीय मूल के शोध छात्र Rishi Atul RajPopat ने जो कार्य किया है वह नितांत सराहनीय है लेकिन इसके बारे में आपको विस्तार से और अच्छे से समझना भी जरूरी है। 

ऋषि राजपोपट ने वी ट्रस्ट डिस्कवरिंग द एल्गोरिदम फार रूल कान्फि्लक्ट रिजोल्यूशन इन द अष्टाध्यायी" इस उलझन को स्पष्ट किया जिन्हें. हम इसको कोई समस्या तो नहीं कहेंगे और गलती भी नहीं कहेंगे लेकिन आगे हम आपको यह सारी बातें स्पष्ट करेंगे। 

SanskritExam. Com™ ने जब कैंब्रिज विश्वविद्यालय के छात्र ऋषि राजपोपट से बात की तो उन्होंने इस विषय में क्या कहा वह सारी बातें भी आगे बताई जा रही है।


जैसे कि आपको पता होगा कि संस्कृत व्याकरण का मूल आधार ग्रंथ पाणिनि अष्टाध्यायी है। 

महर्षि पाणिनि संस्कृत भाषा के या संस्कृत व्याकरण के एक अद्वितीय विद्वान माने जाते हैं। 

हमारे सनातन धर्म में तो महर्षि पाणिनि को आदर के साथ भगवान शंकर का अंश अवतार भी बताया जाता है या यूं कहें कि भगवान शंकर की इच्छा अनुसार एवं कृपा से ही पाणिनि ने संस्कृत व्याकरण को आधुनिक रूप देने के लिए एवं सुव्यवस्थित करने के लिए एक अष्टाध्यायी नामक ग्रंथ की रचना की, 

जो कि हजारों सालों से आज तक पढ़ाया जा रहा है और अभी तक इसमें किसी भी प्रकार की त्रुटि का कोई जिक्र भी नहीं हो सकता है।


कैंब्रिज विश्वविद्यालय के छात्र ऋषि राजपोपट ने जो शोध किया वह कुछ विशेष शोध तो अवश्य है क्योंकि वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में संस्कृत भाषा का आधुनिकीकरण करने के लिए इस शोध की आवश्यकता जरूर होती है। 

हम आपको बता दें कि संस्कृत व्याकरण में सूत्र 2 तरीके से काम करते हैं। एक सामान्य सूत्र और दूसरा अपवाद सूत्र। इसको आप ऐसा भी समझ सकते हैं कि जैसे कोई सूत्र कार्य कर रहा है और उसी सूत्र का एक बाधक सूत्र बन जाता है जो कि कुछ Limitations यानी सीमाएं बना देता है। 

तो उसे अपवाद सूत्र कहते हैं। कैंब्रिज विश्वविद्यालय में किए गए शोध का विषय इसी पर केंद्रित है। ऋषि राजपोपट ने इस सामान्य व अपवाद सूत्र के नियम को एक Conflict के रूप में प्रस्तुत किया और इससे निपटने का एक समाधान बताया। 

हालांकि सोशल मीडिया पर यह एक गलती के रूप में भी स्पष्ट रूप से बताया जा रहा है। कैंब्रिज विश्वविद्यालय में भी ऋषि राज पोपट ने एवं उनके प्रोफेसर वसेन्जो वर्जियानी ने इस सामान्य अपवाद नियम को अलग दृष्टि से बताते हुए स्पष्ट किया है। 

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उन्होंने कहा कि पाणिनि ने जो यह सामान्य अपवाद का नियम बनाया है। यह ऐसा नहीं था बल्कि यह कुछ इस प्रकार से है


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ऋषिराज पोपट के साथ जब SanskritExam. Com™ का संवाद हुआ तो उन्होंने यह कहा- 

महर्षि पाणिनि एक अद्वितीय विद्वान थे मैं उनका बहुत ही सम्मान करता हूं और मैं यह एक शोध कार्य कर रहा हूं। पाणिनि के Meta rules सूत्रों को लेकर में लगभग 9 महीने पहले भी शोध कर रहा था लेकिन उसके बाद में रुक गया. 

जब पहले मैं इस शोध कार्य में असफल हुआ तो बाद में कुछ समय अंतराल में मैंने फिर से यह शोध कार्य प्रारंभ किया। 

पाणिनी व्याकरण इतना वैज्ञानिक एवं विचार की गहनतम सीमा का द्योतक है कि जब मैं पहले इस पर शोध कर रहा था तो मैं बहुत परेशान हो गया‌। 

मुझे किसी भी प्रकार की गुंजाइश नहीं लग रही थी कि क्या मैं अपने इस शोध कार्य में सफल हो पाऊंगा। 

फिर मैं रुक गया और यह पिछली गर्मियों की बात है उस दौरान मैंने कुछ महीनों का ब्रेक लिया मैंने खूब इंजॉय किया‌। घूमने के लिए गया तैराकी की और रिफ्रेश हुआ। 

उसके बाद फिर से मैंने यह कार्य प्रारंभ करना शुरू किया तो अब जाकर के इसमें बहुत ही चमत्कार हुआ। 

जी हां, जब मैंने दोबारा इस पर शोध करना शुरू किया तो उस दौरान में कैंब्रिज विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में पूरी रात सो नहीं पाता था क्योंकि अब मुझे इसका रहस्य मिल चुका था। 

यह जो मुझे समस्या सी लगी उसकी गुत्थी को सुलझाने का रास्ता मुझे मिल चुका था मैं बहुत ज्यादा खुश था और पूरी रात दिन संस्कृत व्याकरण से संबंधित पुस्तकों पर रिसर्च और उनका अध्ययन करने लगा। 

अब जाकर मुझे लगभग ढाई साल के बाद इस रिसर्च पर सफलता मिली। मेरी रिसर्च का मुख्य बिंदु कुछ इस प्रकार था


यह गलती सुलझाई ऋषि राजपोपट ने

इंडिपेंडेंट के अनुसार, पाणिनि ने एक "मेटारूल" (metarule) बताया था, जिस पर कि परंपरागत रूप से विद्वानों ने हमेशा से यही व्याख्या की: 

"समान शक्ति के दो नियमों के बीच संघर्ष की स्थिति में, व्याकरण के क्रम में बाद में आने वाला नियम जीतता है". (विप्रतिषेधे परं कार्यम्) हालांकि, यह अक्सर व्याकरण की दृष्टि से गलत परिणाम देता है. 

मैंने इसी गलत व्याख्या को सही रूप में प्रकाशित किया।


इसी मेटा रूल की पारंपरिक व्याख्या को रिसर्च स्कॉलर ऋषि राजपोपट ने ऐसा कहकर खारिज कर दिया कि पाणिनि का इस समान दो शक्ति यानी दो नियमों के बीच के स्थिति वाले नियम का मतलब पारंपरिक व्याख्या के तौर पर जो लिया जाता है। 

वह नहीं है बल्कि एक शब्द के बाएं एवं दाएं पक्षों पर लागू होने वाली नियम की बात की जा रही है।


ऋषि राजपूत ने बताया कि मैंने निष्कर्ष तौर पर यह निकाला कि महर्षि पाणिनि ने बिना किसी अपवाद रूप से व्याकरणिक सूत्रों का निर्माण किया एवं अपने सर्वश्रेष्ठ सुदृढ़ व्याकरण को स्थापित किया। 


अब आपके मन में शायद यह सवाल जरूर हो सकता है कि यह गलती है या फिर एक रिसर्च कार्य। 

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हम आपको बता दें कि हमारे भारतीय मूल के छात्र ऋषि राजपोपट ने जो यह कार्य किया है वह नितांत सराहनीय है। 

लेकिन उन्होंने यह कहा है कि यह पारंपरिक व्याख्याकारों की एक गलती है न कि पाणिनि। 

महर्षि पानी ने किसी भी प्रकार की गलती नहीं की है बल्कि आज से पिछले ढाई हजार साल यानी जब से पाणिनी व्याकरण की संरचना हुई, तब से इस नियम का जो अर्थ लिया जा रहा है। 

वह गलत है। यह सामान्य उत्सर्ग अपवाद नियम जिस अर्थ में सभी व्याकरण वालों ने लिया है वह गलत है। 

उनका यह रिसर्च कार्य अत्यंत सराहनीय है विशेष रूप से इस कार्य को पाश्चात्य लोगों ने काफी सराहना प्रदान की। उन्हीं का अनुसरण करते हुए भारत में यह काफी ट्रेंड पर चल रहा है। 


इस दौरान काफी बातें ऐसी भी हैं जो सोशल मीडिया पर गलत तौर पर प्रकाशित की जा रही है। 

यहां तक कि कैंब्रिज विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसरवसेन्जो वर्जियानी आदि कुछ ऐसी बातें कर रहे हैं जो उनके संस्कृत व्याकरण की अज्ञानता को दर्शाते हैं। 

यह संस्कृत के उन पारंपरिक अद्यतन एवं श्रेष्ठ विद्वानों के लिए खेद का विषय है। मैं स्वयं भी एक संस्कृत भाषा का पारंपरिक छात्र और इसके अलावा मैंने आधुनिक टेक्नोलॉजी में कंप्यूटर लैंग्वेज As Java, C++, Python आदि पर भी कमांड हासिल की. वेब डेवलपर्स जैसे कार्य एवं विभिन्न कंप्यूटर टूल्स व AI पर भी कार्य किया. 

इसीलिए मैं इस बात को अच्छे से समझ सकता हूं। अतः इस विषय पर मैं यह जरूर कहूंगा कि सोशल मीडिया पर इस रिसर्च के बाद कुछ ऐसी बातें भी हैं जो गलत फैलाई जा रही हैं और इनका आधार विश्वविद्यालय में किए गए रिसर्च के दौरान स्वयं वहां के प्रोफेसर एवं पाश्चात्य शिक्षा का असूक्ष्मता है। 


मैं इस सूचना के प्रसारकों को एवं पाश्चात्य शिक्षा के प्रोफेसर को यह जरूर बताना चाहता हूं कि हमारी संस्कृत व्याकरण परंपरा में पाणिनि के बाद बहुत सारे मनीषी हुए हैं जिन्होंने संस्कृत व्याकरण पर महान से महान ग्रंथ लिखे। 

नागेश भट्ट एवं पतंजलि जैंसे बहुत सारे विद्वान ऐसे हुए हैं जिन्होंने इस विषय पर संकेत बहुत जगह किए हैं लेकिन उन्हें इस प्रकार की कोई गलती महसूस नहीं हुई। 

अतः इस particular छोटे से विषय को Conflict Research के रूप में नहीं लिया गया। 

आपकी इस विषय में क्या राय है। नीचे कमेंट में जरूर बताएं। संस्कृत व्याकरण के इस शोध कार्य पर आपका क्या कहना है। यह भी जरूर बताएं। कि यदि आप एक संस्कृत छात्र हैं तो अपना किसी भी प्रकार का सवाल नीचे पूछ सकते हैं।

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3 Comments

  1. भूरिशो धन्यवादा भवद्भ्यः।भवद्भिः अनेन अनेकेषां संशयो निवारितः।

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    1. SanskritExam Team Welcomes you. स्वागतन्ते क्रियते इतः।

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  2. तथ्यपूर्ण किंतु अनावश्यक रूप से लम्बा।
    वर्तनी की गलतियां और प्रचलित हिंदी पर्याय रहने पर भी अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग ठीक न लगे।
    लेखक विद्वान हैं, जानकार भी। उनका स्वयं अपने बारे में ऐसा लिखना जिससे दिखे कि वे विद्वान और जानकार हैं मुझे सुरुचिपूर्ण नहीं लगा। मेरी समझ से लेखक के विषय मे जो कुछ लिखा गया है वह सब साथ मे कुछ और भी, अंत मे (या शुरु मेँ) अन्य पुरुष में आता तो अधिक अच्छा रहता।

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