भ्रष्टाचार पर कविता- Bhrashtachar Par Kavita | भ्रष्टाचार पर व्यंग्य | Poem On Corruption In Hindi by Sandeep Kothari

भ्रष्टाचार पर कविता- Bhrashtachar Par Kavita | भ्रष्टाचार पर व्यंग्य | Poem On Corruption In Hindi by Sandeep Kothari

प्रिय पाठकों, वर्तमान में भ्रष्टाचार बहुत ज्यादा फैल रहा है। पहले भ्रष्टाचार राजनीति क्षेत्र में ज्यादा देखा जाता था लेकिन आजकल के इस मतलबी जमाने में चारों तरफ भ्रष्टाचार देखने को मिल रहा है। फिर चाहे वह राजनीति क्षेत्र हो या धार्मिक क्षेत्र। 

जहाँ भी बड़े-बड़े लोग अपनी गद्दी पर बैठे हुए हैं। उनके भ्रष्टाचार को देखकर आंखें थक जाती है। यहां भ्रष्टाचार पर कविता - Bhrashtachar Par Kavita अर्थात भ्रष्टाचार पर व्यंग्य काव्य प्रस्तुत किया गया है। 

यह कविता राष्ट्रकवि संदीप कोठारी द्वारा विरचित है। इस कविता में भ्रष्टाचार पर तीखा व्यंग्य किया गया है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि श्री संदीप कोठारी हिंदी, संस्कृत तथा अंग्रेजी के विशिष्ट कवि हैं। अनेकों ज्वलंत समस्याओं पर इनके हृदय स्पर्शी काव्य हैं। 

माननीय आदरणीय कवि संदीप कोठारी विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से अनेकों बार पुरस्कृत हैं। उनकी यहां भ्रष्टाचार पर व्यंग्य कविता आपको जरूर पसंद आएगी। Poem On Corruption In Hindi by Sandeep Kothari


भ्रष्टाचार पर कविता- Bhrashtachar Par Kavita

भ्रष्टाचार पर आधारित इस कविता में कवि ने भ्रष्टाचार पर तीखा एवं कटु व्यंग्य किया है। यहां तक कि कवि भ्रष्टाचार को देखते हुए बड़े-बड़े पदों पर बैठे हुए भ्रष्टाचारी लोगों को कुत्ते जैसे शब्द से संकेतिक करना चाहते हैं, जो कि उचित ही है। 

इस कविता में भ्रष्टाचार का यथार्थ चित्रण किया गया है। कविता बहुत ही सरल व सरल शैली में है, जिससे कि इसका अर्थ सामान्य जन को भी स्पष्ट हो जाता है। 

प्रिय पाठकों, यदि आप में से भी कोई कवि है और अपनी कविता अथवा अपना कोई विशेष लेख भारत की नंबर वन इस वेबसाइट पर प्रकाशित करवाना चाहता है तो हमारे टेलीग्राम ग्रुप में जुड़ कर हमें भेज सकता है। 

आपका काव्य आपके नाम के साथ निशुल्क रूप से प्रकाशित किया जाएगा। आइए, भ्रष्टाचार पर इस व्यंग्य कविता को पढ़कर आनंद लीजिए। धन्य है कवि संदीप कोठारी की यह लेखनी। भ्रष्टाचार पर व्यंग्य | Poem On Corruption In Hindi by Sandeep Kothari



🔥भ्रष्टाचार पर व्यंग्य कटाक्ष कविता🔥

कुत्ता बैठा आसमान पर
कुतिया गीदड़ गोदी में
चुप बैठा वनराज विपिन का
माँ धरती के कोने में।।

स्वर्ग सी नृत्यांगना वो,
मानो अब तो नग्न भ‌ई।
पापिन् बोलो, नागिन बोलो
श्वानराज जो तृप्त भयो।

पापकुम्भ की इस नगरी में
पापराज ही राज करे।
शेर छुपाए मुँह बैठा है,
धेनु-वत्स दारुण वन में।।

देख सिपाही! क्या होता है
आसमान की गद्दी पर
चाँद सितारे लुप्त भयो अब
नरदानव नभमण्डल में।।

दुर्जन का सीना चौड़ा है
सज्जन सिकुड़ा बैठा है।
नारी देखो ना रह पायी
नार पवित्र के सिंचन में।।


राष्ट्रकवि सन्दीपकोठारी द्वारा रचित- कटाक्षकाव्यसंग्रह से गृहीत
🖊️कविः- सन्दीपकोठारी
👆🌺🔥🌿🌏👆


भ्रष्टाचार पर केन्द्रित उपरोक्त कविता का भावार्थ

प्रिय पाठकों, हमें उम्मीद है आपको उपरोक्त कविता का व्यंग्यार्थ अच्छे से समझ में आ गया होगा। कविता में सरल शब्दों का ही प्रयोग किया गया है। यह राजनीतिक भ्रष्टाचार पर कविता बहुत ही यथार्थ है।

कवि संदीप कोठारी की शैली भी अत्यंत सरल होती है। इनकी सभी कविताओं में सरस एवं मधुर शैली का प्रयोग किया गया है। जिससे सामान्य पाठक भी इनकी कविताओं का अर्थ ग्रहण कर पाता है।

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आज की इस कविता श्रृंखला में कवि संदीप कोठारी द्वारा विरचित भ्रष्टाचार पर व्यंग्य कविता,   Poem On Corruption In Hindi by Sandeep Kothari अर्थात् भ्रष्टाचार पर कविता- Bhrashtachar Par Kavita प्रस्तुत की गयी। bhrashtachar per kavita

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