भगवत गीता 12 अध्याय संस्कृत PDF | Gita Chapter 12 Sanskrit Hindi

भगवत गीता 12 अध्याय संस्कृत PDF | Gita Chapter 12 Sanskrit Hindi 

भगवद् गीता का 12वां अध्याय ‘भक्ति योग’ के नाम से विख्यात है। यह अध्याय पूरी श्रीमद्भगवद्गीता के अंतर्गत विशेष महत्व रखता है। इसका कारण यह है कि इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को भक्ति योग का विशेष महत्व बताया है।

इससे पहले गीता के दूसरे अध्याय से लेकर 11वें अध्याय तक सांख्य योग, कर्म योग, ज्ञान-विज्ञान योग, विभूति योग आदि विभिन्न विषयों की चर्चा हुई है। अब 12वें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण भक्ति का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं।

आपको ज्ञात होगा कि भगवद्गीता के प्रत्येक अध्याय का एक विशेष नाम दिया गया है। हमने पिछले एक आर्टिकल में गीता के सभी अध्यायों के नाम एवं उनकी श्लोक संख्या के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी दी है, जिसे आप पढ़ सकते हैं।

यहाँ SanskritExam.com वेबसाइट के इस आर्टिकल में Gita Chapter Twelve Sanskrit Hindi प्रस्तुत किया जा रहा है। इसके साथ ही Gita Adhyay 12 PDF Gita Press भी उपलब्ध कराया गया है, जिसे आप आसानी से डाउनलोड कर सकते हैं। यह PDF संस्कृत तथा हिंदी अनुवाद सहित उपलब्ध है। गीता प्रेस

Gita Dwadash Adhyay PDF डाउनलोड करने से पहले इसके बारे में कुछ विशेष बातें जान लीजिए।

भगवत गीता 12 अध्याय संस्कृत PDF | Gita Chapter 12 Sanskrit Hindi


भगवद्गीता 12 अध्याय परिचय

जैसा कि हमने पहले बताया, भगवद्गीता का 12वाँ अध्याय ‘भक्ति योग’ के नाम से जाना जाता है। इस अध्याय की शुरुआत अर्जुन के प्रश्न से होती है। इस अध्याय में कुल 20 श्लोक हैं।

इन 20 संस्कृत श्लोकों में भक्ति से संबंधित सभी प्रकार की बातें बताई गई हैं और सभी प्रकार के संशयों का समाधान किया गया है।

सबसे पहले इस अध्याय का पहला श्लोक अर्जुन द्वारा प्रश्न के रूप में पूछा गया है। इसमें अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि आपके भक्त विभिन्न प्रकार के होते हैं- मुख्यतः सगुण और निर्गुण। इन दोनों में कौन श्रेष्ठ है?

एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते।

ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः।। (गीता अध्याय 12, श्लोक 1)

संस्कृत अन्वय- एवं ये भक्ताः सततयुक्ताः ये च अव्यक्तम् अक्षरं त्वां पर्युपासते, तेषां योगवित्तमाः के?

संस्कृत व्याकरण- एवम्= अव्ययम्, सततयुक्ताः= प्रथमाबहुवचनं समस्तपदम्, ये= पुंसि यत् शब्दस्य प्रथमाबहुवचनम्, भक्ताः= प्रथमाबहुवचनम्, त्वाम्= द्वितीयैकवचनम्, पर्युपासते= परि+उप+आस् लटि आत्मनेदपबहुवचनम्, ये= बहुवचनम्, च= अव्ययम्, अक्षरम्= द्वितीयैकवचनम्, अव्यक्तम्= द्वितीयैकवचनम्, तेषाम्= षष्ठीबहुवचनम्, के= पुंसि प्रथमाबहुवचनम्, योगवित्तमाः= प्रथमाबहुवचनं समस्तपदम् (योगं वेत्तीति योगवित् ते च योगविदः, तेषु उत्तमाः योगवित्तमाः उपपद-सप्तमीतत्पुरुषसमासः)

हिंदी अर्थ:

जो भक्त निरंतर आप में मन लगाकर सगुण रूप से आपकी उपासना करते हैं, तथा जो आपके अक्षर, अविनाशी एवं अव्यक्त निर्गुण ब्रह्म की उपासना करते हैं- उन दोनों में कौन श्रेष्ठ है?

अर्जुन के इस प्रश्न के उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण सगुण और निर्गुण भक्ति का विवेचन करते हैं। यद्यपि दोनों ही भक्ति के प्रकार हैं और दोनों का महत्व है, फिर भी भगवान अपना मत स्पष्ट करते हैं।

मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।

श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमाः मताः।। (गीता अध्याय 12, श्लोक 2)

हिंदी अर्थ:

जो भक्त अपना मन मुझमें लगाकर, श्रद्धा से युक्त होकर निरंतर मेरी उपासना करते हैं, वे मुझे श्रेष्ठ (युक्ततम) लगते हैं।

यहाँ भगवान सगुण भक्ति की विशेष प्रशंसा करते हैं। आगे के श्लोकों में वे निर्गुण ब्रह्म की उपासना करने वालों का भी वर्णन करते हैं और बताते हैं कि वह मार्ग अत्यंत कठिन है।

भगवान कहते हैं कि निर्गुण मार्ग कठिन होने के बावजूद जो भक्त अनन्य भाव से मेरी शरण में आते हैं, मैं उन्हें इस संसार रूपी सागर से पार कर देता हूँ-

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्। (गीता अध्याय 12, श्लोक 7)

अर्थात्, सगुण भक्ति करने वाले भक्तों को भगवान स्वयं जन्म-मरण के संसार से पार कराते हैं।

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आगे के श्लोकों में भगवान यह भी बताते हैं कि भक्ति कैसे की जाए, एक साधारण व्यक्ति या पापी से पापी मनुष्य भी किस प्रकार भगवान की भक्ति करके जीवन को सफल बना सकता है।

इस प्रकार, इस अध्याय में भक्ति से जुड़े सभी महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर अत्यंत सरल और गहन रूप में दिए गए हैं।

नीचे Gita Chapter Twelve Sanskrit Hindi (Gita Dwadash Adhyay) का PDF उपलब्ध कराया गया है। आप इसे डाउनलोड करके संस्कृत एवं हिंदी अर्थ सहित पढ़ सकते हैं।

अन्य स्तोत्र, भगवद्गीता के विभिन्न अध्यायों के PDF तथा सनातन धर्म के ग्रंथों के PDF प्राप्त करने के लिए वेबसाइट के PDF सेक्शन में अवश्य जाएँ। 

भगवद्गीता 12 वां अध्याय PDF

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